Saturday, June 15, 2013

जहाँ बाँस फूलते हैं: जनजातीय संघर्ष और विद्रोह
सुभाष कुमार गौतम
भारतीय इतिहास में यह उल्लेख मिलता है कि आज़ादी की पहली लडाई अंग्रेजों से आदिवासियों ने लड़ी थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात उम्मीद की गई थी कि अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की शुरूआत करने वाले आदिवासियों की स्थिति में काफी परिवर्तन आएगा। पर हुआ ठीक इसके उल्टा उनके इतिहास को भूला कर उन्हें विकास की मुख्यधारा से वंचित कर दिया गया। जिसकों लेकर आदिवासियों में इस असंतोष के विरोध में प्रतिरोध के स्वर बुलंद होते रहें। यह असंतोष कभी नक्सलवाद तो कभी माओवाद जैसे विद्रोह के रूप में दिखें। पूर्वोत्तर भारत में यह असंतोष नागा विद्रोह और मिजों विद्रोह के रूप में उभर कर सामने आया।  
श्रीप्रकाश मिश्र का उपन्यास ‘जहाँ बाँस फूलते हैं’ का विषय 1968 में लालडेंगा के विद्रोह पर केन्द्रीत है। अनुभव एवं स्मृतियों के अधार पर लिखा गया यह उपन्यास बहुत ही दिलचस्प है। इस उपन्यास की शुरूआत ईसाई उत्सव से शुरू होती है और अंत इसके ठीक विपरित मिजो विद्रोह में मारे गये विद्रोहियों के शोक से होता है। मिजोरम में मिजों जनजातियों में यह मान्यता रही है कि मिजोरम में जब बाँस फूलते हैं तो वह अकाल पडने का संकेत होता है। कुछ लोगों में यह भी मान्यता है कि मिजोरम में बाँस फूलते हैं तो उस बाँस के फूल को चूहे खाते हैं और उनसे बहुत सारे चूहें पैदा होते हंै, जो वहां की फसलों को नष्ट कर देते है। ‘‘पूर्वोत्तर में ज़मीन पर जो कुछ भी हैं उसमें सबसे अधिक बाँस और सुपारी दिखाई देते हैं। बाँस यहाँ की जिं़दगी में, शरीर में खून ले जाने वाली धमनियों की तरह शामिल है। मेघालय में सिंचाई की नालियों की तरह, मिजोरम के सुदूर गाँवों में बरसाती पानी को घर तक लाने वाली पाइप लाइन, नागालैंड में चाकू की तरह और कई इलाकों में तो थाली-कटोरी की भी तहर इस्तेमाल किया जाता है। उसके फूलों के विध्वंस की ताक़त भयानक है। यह बजती हुई बाँसुरी के अचानक किसी स्वर पर गरदन उतारने वाली तलवार में बदल जाने जैसा अजूबा लगता है।’’1 
मिजोरम का प्रमुख उत्पाद बाँस है, बाँस फूलने की परिघटना को अकाल की सूचना से जोड़ कर देखा जाता है। इसके लिए मिजो में भाषा में ‘माउटम’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। ‘‘ये फूल बिरले आते हैं लेकिन जब आते हैं तो प्रकृति नया असंतुलन पैदा करती है। चूहे इन फूलों को खाते हैं जिससे उनकी प्रजनन शक्ति असामान्य ढंग से बढ़ जाती हैं। लाखों की संख्या में पैदा हुए चूहे खेतों की फसलें, घरों में रखा अनाज, फल, सब्जियाँ समेत जो सामने आता है सब चट कर जाते हैं। साल बीतते-बीतते अकाल पड़ जाता है। आदिवासी बूढ़ों का कहना था कि अगले तीन साल में इस इलाके में ज्यादातर बाँस की कोठियों में फूल आएंगें। उससे पहले अगर सारे बाँस जला नहीं दिए जाते तो तबाही तय है।’’2 
इस प्रकार मिजों विद्रोह के प्रमुख कारणों में बाँस के फूलने से आए दूर्भिक्ष भी रहा होगा। उसके साथ एक और कारण मिजोरम के प्रति उपेक्षा का भाव था। कुछ लोग इसकी चर्चा ईसाई विद्रोह के नाम से करते है। जब बात हो रही हो मिजों विद्रोह की तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ‘‘आदिवासी असंतोष के प्रमुख कारण आर्थिक और सामाजिक रहे हैं। ईसाई मिशनरियों तथा धर्म परिवर्तन की घटनाएं भी एक कारण रहे है। बाहरी लोगों ने इनके जीवन और जीवनपद्धति तथा इनकी परंपराओं में घुसपैठ की, इन आदिवासियों ने हथियार उठा लिए। जब-जब इनका दमन और शोषण हुआ ये चुप नही रहे। इनकी मजबूरियों का फायदा उठाने की हर कोशिश का उन्होनें विरोध किया।’’3 श्री प्रकाश मिश्र के उपन्यास ‘जहाँ बाँस फूलते है’ आदिवासी असंतोंष से उपजे मिजो विद्रोह की पृष्ठभूमि को समझने और जानने में सहायक सिद्ध होता है। रामचंद्र शुक्ल ने अपने एक लेख ‘उपन्यास’ में लिखा ‘‘बहुत से लोग उपन्यास का आधार कल्पना बतलाते हैं। पर उत्कृष्ट उपन्यासों का आधार शक्ति है न कि केवल कल्पना’’ आगे अनुमान के साथ यथार्थ का संबंध स्पष्ट करते हुए ‘‘ऐतिहासिक उपन्यास अनूमानमूलक और सत्य हैं। उच्च श्रेणी के उपन्यासों में वर्णित छोटी-छोटी घटनाओं पर यदि विचार किया जाए तो जान पडे़गा कि वे यथार्थ में सृष्टि के असंख्य और अपरिमित व्यापारों से छंटे हुए नमूने हैं।’’4 श्रीप्रकाश मिश्र अपने उपन्यास के प्राक्कथन अंश में लिखते हंै कि ‘‘यह उपन्यास ऐतिहासिक नहीं है। कहीं इक्का-दुक्का वास्तविक व्यक्तियों के नाम आए भी है तो कथा को विश्वसनीय बनाने के लिए। अगर किसी के जीवन के टुकड़े से कोई अंश इत्तेफाक करता मिलेगा तो सिर्फ इस लिए कि कल्पना की दिवार कहीं-न-कहीं यथार्थ की बुनियाद पर ही बनती है। फिर भी यह उपन्यास आम पाठक को पूर्वोत्तर भारत की समस्या समझने की खासी सामाग्री देगा।’’ इस प्रकार ‘जहाँ बाँस फूलते हैं’ उपन्यास कल्पना की जमीन पर यर्थाथ की इमारत खडा करने की एक कोशिश मात्र है। जो मिजो विद्रोह की समस्या और सरकार के रहस्यों को उदघाटित करने का प्रयास मात्र है। यह उपन्यास उन रहस्यों पर से पर्दा उठाने का काम करता है जो मिजो समस्या और विद्रोह के कारण बने। पूर्वोत्तर भारत के विषय में हिन्दी में की गई लगभग सभी रचनाएँ चाहे वह उपन्यास हो या यात्रा विवरण या  कथा सभी के विषयवस्तु ऐतिहासिक है।
मिजो विद्रोह से पहले नागा विद्रोह भारत की आजादी के बाद सन् 1947 में आरंभ हो गया था। जिस विद्रोह को सन् 1997 में करीब 50 दौर की वर्ता के बाद संघर्षविराम दिया गया। इस पर सहमति गृहमंत्रालय के हस्तक्षेप से बनी। मिजोरम के पडोस में एक तरफ नागा विद्रोह चल ही रहा था, इधर लालडेंगा ने मौके का सही फायदा उठाया मिजो विद्रोह की शुरूआत कर दी। ‘‘सन् 1959 में बाँस के फूल खाकर उन्मत्त चूहों ने खेतों, जंगलों, बस्तियों पर धावा बोल दिया, मौतम (अकाल) की नौबत आ गई। मिजो कछार के गांवों की तरफ़ भागने लगे लेकिन स्थानीय आबादी और असम पुलिस ने वापस ठेल दिया। मिजों नेताओं ने असम सरकार से गुहार लगाई। जब तक प्रशासनिक मशीनरी हरकत में आती वहां अगले पचीस साल तक चलने वाले रक्तपात की पुख्ता नींव पड़ चुकी थी। सरकार से निराश लोगों ने आपातकालीन संगठन बनाए। इन्हीं में से एक मिजो फेमाइन फ्रंट (एमएफएफ) था जिसे सेना में हवलदार रैंक के क्लर्क रहे लालडेंगा ने बनाया था। पूर्व सैनिकों और युवा वालंटियरों को एक नेटवर्क तैयार कर लालडेंगा ने दूरदराज के गांवों तक अनाज भेजना शुरू किया। कभी भारत की फ़ौज में रहे रिटायर्ड बूढ़े रसद के साथ एक संदेश भी ले जाते थे, ‘दिल्ली और असम की सरकारों को भूख से मरते मिजो लोगों की परवाह नहीं है इस लिए अब अलग देश के लिए लड़ाई छेड़ने का वक्त आ गया है।’ एमएफएफ एक दिन मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) में बदल गया और अलग मिजो राष्ट्र मांगने लगा। भारत सरकार ने इसे एक क्लर्क की सनक समझा और दरकिनार कर दिया।’’ लालडेंगा और उनके लडके आईएसआई से संपर्क साध कर पूर्वी पाकिस्तान के चटगांव पहुंच गए। वहां से हथियार व गुरिल्ला युद्ध की टेªनिंग लेकर मीजोरम की पुलिस चैकियों पर हमले करने लगे। फरवरी 1966 की एक रात उन्होंने ‘आपरेशन जेरिको’ के जरिए आईजाल के रेडियो स्टेशन, टेªजरी और थाने पर कब्जा कर देश को स्तब्ध कर दिया। ईसाई आबादी का समर्थन पाने के लिए इस हमले को लालडेंगा ने धार्मिक रंग दे दिया। मिथकों के अनुसार हजरत जोशुआ ने परमपिता के आदेश पर जेरिको के किले की दिवारें गिरा दी थीं ताकि उनके भक्तों को अपना वतन मिल सके।’’
’’आईजाल पर कब्ज़ा पाने के लिए किसी उग्रवादी संगठन के खिलाफ एयर फोर्स के हेलीकाप्टरों का इस्तेमाल पहली बार किया गया था। अगले पाँच साल तक सेना प्रोटेक्टेड प्रोग्रेसिव विलेज(पीपीवी) बसाती रही और उग्रवादी छापामार युद्ध चलाते रहे। पीपीवी की तुलना यहां हिटलर के नाजी कैंपों से की जाती है। उग्रवादियों को जनता से काटने के लिए मिजोरम के सारे गाँव उजाड़ कर सड़कों के किनारे टीन की चादरों के नीचे बसाये गए जहाँ रात में कफ्र्यू होता था। बिना आई कार्ड दिखाए कोई आ-जा नहीं सकता था। सेना की सतत परपीड़क चैकसी के चलते निजी जिंदगी क्या होती है लोग भूल गए। दमन के कारण दिल्ली से मोहभंग और बढ़ा। उधर बर्मा के जंगलों में एमएनएफ की सात बटालियनें खड़ी हो चुकी थीं और लालडेंगा अब चीन जाकर चाऊ एन लाई से बात कर रहे थे। मीजो अपनी जाति को चीन की एक गुुफा चिनलुंग से उत्पन्न बताते हैं। सदियों के सफर में वे वहां से तिब्बत, बर्मा की हक्वांग और कबौ घाटियाँ पार करते हुए अठारहवीं सदी लुसाई हिल्स में आकर बसे थे।’’ 
‘‘कुछ साल बाद इन गांवों को दुबारा बसाया गया। 1985 में मिजोेरम को अलग राज्य बनाना पड़ा। 1987 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ समझौते के बाद लालडेंगा को कांग्रेस का मुख्यमंत्री हटाकर मुख्यमंत्री बनाना पड़ा। गाँवों का सामुदायिक जीवन सेना नष्ट कर चुकी थी। अपराध बेतहाशा बढे़ और आधा मिजोरम उजड़ कर तीन शहरों में बस गया। मिजोरम में उग्रवादियों समेत लगभग हर आदमी को किसी न किसी प्रकार की क्षति का मुआवजा दिया गया जिसके नतीजे में भ्रष्टाचार मिजोरम का पर्याय बन गया है। अब आईजाल को भारत का सबसे मंहगा शहर माना जाता है जहाँ नशेडियों की तादाद बहुत ज्यादा है।’’5 ‘जहाँ बाँस फूलते हैं’ उपन्यास का समय लालडेंगा का विद्रोह हैं। वैसे तो इस उपन्यास में बहुत सारे पात्र हैं। पर मुख्य नायक रूआलखूमा है। जिसके बहादूरी की चर्चा मिजोरम में ही नहीं पडोसी देशों में भी होने लगी थी। रूआलखूमा ने मिजोरम में फौज के छक्के छुडा दिए थे। फौज उसके नाम से ही कांपती थी। रूआलखूमा के एन्काउंटर के समय जो संवाद हुआ उसमें वह कहता है कि ‘‘मेरा हाथ खोल दो’’ ‘‘मैं एक मुक्त प्राणी की तरह मरना चाहता हूं’’ इस प्रसंग से यह पता चलता है कि वह कितना बडा योद्धा था कि मरने के समय भी फौज के सामने  झुका नहीं । ठीक उसी तरह संवाद करता है जैसे राजा पोरू ने सिकंदर से किया था।
आदिवासी समाज अपने रीति-रिवाजों और रहन-सहन को लेकर मुख्यधारा के समाज से काफी भिन्न रहा है। अलग-अलग क्षेत्रों के आदिवासी अपने-अपने स्वरूप में मुख्यधारा के समाज से भिन्न हैं। पर मुख्यधारा के समाज से उनकी अपनी अलग पहचान है। आदिवासी समाज को देखा जाए तो कहीं न कहीं सांस्कृतिक रूप से मुख्यधारा के समाज से मजबूत हैं। जहां तक दलितों से उनकी तुलना की बात करे तो दलित समाज से कही ज्यादा उनका अच्छा इतिहास रहा है। अपने समुदाय और क्षेत्र में उनकी अपनी राजसत्ता रही है। श्यामाचरण दुबे का कहना है कि ‘‘जनजातियों के सामाजिक संगठन के स्वभाव और उसकी जटिलता में बड़ी भिन्नता पायी जाती है। भारत में अधिकांश भागों में आदिवासी समूहों में पुरूष की प्रधानता है। वहीं दक्षिण और उत्तर पूर्व में स्त्री प्रधान समाज रहा है।’’ इस प्रकार हम दावे के साथ यह बात कह सकते है कि मुख्यधारा के समाज में जितनी दैयनिय स्थिती स्त्रीयों की रही है उसकी तुलना में आदिवासी समाज में स्त्रीयों की स्थिती काफी बेहतर रही है। 
‘जहाँ बाँस फूलते हैं’ उपन्यास में भी अगर देखा जाए तो स्त्री की आर्थिक और सामाजिक स्थिती अच्छी नहीं हंै। लेकिन उपन्यास में लेखक ने मिजों स्त्री पात्रों का जिस प्रकार से दिखाया है वो यर्थाथ के करीब नही दिखाई देता है। यह उपन्यास मिजोरम के स्त्री समाज को सम्मान की नजर से नहीं देखता जो उपन्यास की सबसे बड़ी कमी है। दरसल लेखक श्रीप्रकाश मिश्र मिजोरम में मिजो विद्रोह के समय सरकार के खुफिया विभाग के अंग रहे है। इस कारण भी ऐसा हो सकता है। उपन्यास को पढते समय जो बात खटकती है वो स्त्रियों के साथ किए गए दुष्कर्म का विवरण है। जिसकी चर्चा बहुत ही गंदे शब्दों में की गयी है। लेखक उत्तर-प्रदेश के देवरिया जिले के निवासी है इसका भी प्रभाव हो सकता है। देवरिया में खास कर सवर्ण समाज के लोग गैर सवर्ण समाज की स्त्रीयों के लिए जिस तरह की भाषा का प्रयोग राजमर्रा की जिन्दगी में करते है, ठीक उसी प्रकार श्रीप्रकाश मिश्र भी वैसे ही शब्दों का चयन करते है। साथ ही बहुत सारे भोजपूरी अपशब्दों का चयन करते हैं। उदाहरण के लिए ‘‘इस इलाके के इतिसाह में यह पहला मौका था कि साइलो की पंचायत में कोई गैर-साइलो सभा अध्यक्ष बना था और यह श्रेय गांव के बूढे़ जमदुग्गीलाल को मिला था। वह सताया हुआ आदमी था और सोच रहा था कि इस साइलो ने हमारी जाने कितनी विवाहिताओं, कुमारियों को ‘‘गाभिन’’ किया तो पंचायत नहीं बैठी और इसकी बीवी गाभिन हो गई तो पंचायत बैठी है। 
पंचायत बोली ‘‘इसकी सजा दोला को दस कोड़े और सौ रूप्या है।’’
दोला बोला ‘‘मैं राल्ते कौम का हूँ। लुशेई कानून मुझ पर नहीं लगता।’’
अकसर ही चुप रहने वाले बूढ़े ने कहा, ‘‘जुर्म लुशेइयों के बीच करेगा, लुशेइयों के साथ करेगा और आइन बधारेगा रल्ते का? अरे दस कोड़े के साथ इसे बीस जूता भी मारना चाहिए और जूते का पैसा भी लेना चाहिए।’’... हर मासिक के बाद लुशेई लड़की पवित्र हो जाती है।’’6 इस प्रकार के शब्दों का चयन कर उपन्यासकार आखिर क्या कहना चाहता है। यह बात बहुत महत्वपूर्ण हैं। इस उपन्यास में जगह जगह स्त्रियों के प्रसंग हैं जो मिजोरम की यथास्थिती से कम मेल खाते है। वहां की स्त्रीयों के बारे में कहा जाता है कि वो जिस भी पुरूष से प्रेम करतीं हैं उसके साथ जीवन भर निर्वाह करतीं है। आज जिस प्रकार पुलिस व सभ्य समाज के लोग यह आरोप लगातेे हंै कि नक्सली और माओवादी लोग अपने साथ रहने वाली स्त्रियों के साथ शारीरिक और दैहीक शोषण करते है। आरोप चाहे जो लगता रहा हो पर ज्यादा तर मामले में पुलिस और सेना के जवान देखे गए हैं। उदाहरण के लिए छत्तिसगढ की सोनी सोरी के मामले को देख सकते है। ‘‘कुछ दिन बाद कैंप से चलते वक्त खूमा ने कहा था, ‘‘कामी जब तक मैं नही आता हूं यही रहना। कैंप में थोडी दिक्कत तो होगी, किंतु कुछ दिनों में अभ्यसत हो जाओगी।’’
पर कामी को कोई दिक्कत न हुई। पूरा सेक्सन दिनभर उसके इर्द-गिर्द चक्कर काटता और रात होते ही कोई न कोई उसे आगोश में ले लेता। सभी भूखे थे-कोई महीने से तो कोई वर्षों से। किंतु वे खाने पर एक साथ नहीं टूटते। अपनी बारी के दिन का इंतजार करते और मौका मिलने पर वे अपनी तृप्ति से अधिक कामी की तृप्ति का ख्याल रखते और मन ही मन खूमा को दुआ देते इस इंतजाम के लिए। और कामी रोज यही नापती की इस सुख की गहराई कितनी है? है भी कि नही ? उसे कैंप में मर्द बदलने की ऐसी आदत पड़ी कि जीवन भर वह किसी एक मर्द से संतुष्ट होकर न रह पाई।
और फिर हर मैथुन पर उसे झा (वाई) की याद आती। शुरू में याद आने पर उसके ललाट पर पसीना चुहचुहा आता, सांस तेज चलने लगती, आंखे मुंद जातीं मुठिठ्यां भिच जातीं और वह दांत पीसकर रह जाती।... अब मुठिठ्यां नहीं भिचती और एक दिन तो आंख मुंदने पर वह मुस्करा उठी। लगा झा यहीं कहीं खड़ा है । फिर जो भी मर्द उसके पास आया, झा ही लगा। और जब महीनों बाद खूमा कैंप लौटा तो उसने आंखें मटका कर पहला ही प्रश्न किया ‘‘झा को मार डाला’’
‘‘नहीं’’
खुमा एक कसूरवार सिपाही तक को नहीं मार पाया था। मारा था तो एक बेकसूर सीधे सादे वाई (गैर मिजो) को बड़ी कायरता से । उसका मन ग्लानि से भर गया।’’7 झा का कामी और जोरमी सें दोनों प्रेमप्रसंग चलता है। जोरमी झा के बच्चे की मां बनने वाली होती है। लेकिन झा मानने से इनकार कर देता है। इसी प्रसंग से क्रोधित हो कर कामी झा से बदला लेने की ठानती है और रूआलखूमा से उसकी हत्या करवाना चाहती है। इस संदर्भ को पढ कर मिजोरम का यह परिदृश्य उभरता है कि सरकार के आदमी और मिजों विद्रोही दोनों ने ही वहां की स्त्रीयों का भयानक शारीरिक शोषण किया। यह कितना सच है? क्या मिजो समाज पुलिसिया समाज कि तरह स्त्रियों के मामले में बर्बर है? 
लेखक ने स्त्रियों के संदर्भ में एक प्रसंग में लिखा है -‘‘सभी लोग इकट्ठे हँस पड़े। कामी आपातमस्तक जल गई! आखि रवह जोवा से कम-से-कम 12 वर्ष बड़ी है। गाँव की सबसे सिनियर नुला है। उससे इस तरह की बात नही की जा सकती। वह दाँत पीस कर घूम गई। ‘‘गारत गिरे मुए पर। सिपाही अभी ही पकड़े ले जाएं। मन-ही-मन जोवा को कोसती वह दहलापकड़ खेलने बैठ गई। नुथलुई रौपारी अपने स्तनों और कूल्हों को एक साथ हिलाती हाथ चमकाकर बोली, ‘‘जोवा के आगोश में एक बार बैठ ही जा कामी, तुझे मेमने का मजा मिलेगा और जोवा को ‘‘बहिला’’ बूढ़ी भैंस का।’’8 इसी क्रम में एक और प्रसंग है - मीजो में बासा गांव में एक साइकिया नाम का आदमी रहता है। जोरमी बोली ‘‘छुटटा बैल की तरह सुबह ही सुबह क्यों घूमने लगे? भलाई इसी में है कि बासा में भी न रहों। कैंप में जाकर रहो।’’... उधर जोरमी भी गर्भ की बोझ से गहबर कांतिहीन हो गई थी।...जोरमी उसी स्वर में बोली सभी मुझे रंडी कहते है।9..उधर कामी को लेकर खूमा को डर हो जाता कै कि कामी कहीं वेश्या न बन जाए इसी डर से उसे डोपा वापस छोड जाता है। झा के गुनाह की सजा साइकिया को भूगतनी पडती है। जंगल से विद्रोही आकर सरेआम उसे गोली मार देते हैं। उपन्यास में कही तारतम्यता नहीं है। लेखक कहानी कहते कहते किसी और प्रसंग को छेड देता है। स्त्री को लेकर लेखक की यौन कुंठा और सवर्ण मानसिकता ने कन्टेन्ट को विकृत कर दिया है। 
उपन्यास का अंत कुछ इस प्रकार होता है। मिजों विद्रोहियों की पराजय होती हैं, सरकार द्वारा शांति-वार्ता की चर्चा होती है लेकिन वह असफल हो जाती है। बहुत अधिक संख्या में विद्रोही मारे जाते है जो बच जाता है वो जंगलों में चला जाता है। माइकल का तबादला गोवा हो जाता है। डोपा में माइकल की पोस्ट-इनचार्ज के रूप में नियुक्ति हुई रहती है। पुई की मृत्यु के बाद पूरा गांव शोकाकुल हो जाता है। ठेकेदार कृष्णन कहता है कि गांव से संबंध सुधारने का बहुत अच्छा मौका है। मिजो विद्रोह में चर्च के पादरियों का हाथ होने की अशंका जताई जाती थी। चर्च की सह पर सी.आई.ए यहां सक्रिय थी। माइकल ही एक ऐसा व्यक्ति है जो इन परिस्थितियों से लड कर यहां का माहौल सुधार सकता था। उसके तबादले से  शांति-प्रयास खटाई में पड़ जाते हैं। नयी लड़ाई शरू होने की आशंका बढ़ जाती हैं। माइकल डोपा में बड़ा लोकप्रिय हो गया था। उसके स्थानान्तरण से डोपा के लोग दुखी थे। उन्होंने उसे रोकना भी चाहा। माइकल जब विदा ले रहा होता हैं उस समय कामी ने रूआलखूमा की लिखी कविताओं की डायरी माइकल को देती है। माइकल उसे अपने साथ लेजाना चाहता हैं, किंतु कामी कहती है, ‘इस गांव को और इस जंगल को मेरी जरूरत है। मिजोरम को हमेशा ऐसा ही नहीं रहने देना है। उपन्यास में मिजों और भोजपूरी शब्दों का खूब प्रयोंग किया गया है। स्थानीय बोली-बानी आंचलिकता का सबसे मजबूत पक्ष है। आंचलिकता में लिखा गया उपन्यास तथ्यों से भरपूर है। कुल मिलाकर यह एक रोचक उपन्यास है।

संदर्भ-
1. अनिल यादव, वह भी कोई देस है महाराज, अंतिका प्रकाशन गाजियाबाद, 2012, पृष्ठ-47
2. वही, पृष्ठ-47
3. यशवंत कोठारी, आदिवासी असंतोष: कारण और निवारण, रचनाक्रम, मई 2010
4. गोपाल प्रधान, हिन्दी उपन्यासों में नार्थईस्ट, समकालीन जनमत, सितंबर 2007
5. अनिल यादव, वह भी कोई देस है महाराज, अंतिका प्रकाशन गाजियाबाद, 2012, पृष्ठ-47,48
6. श्रीप्रकाश मिश्र, जहाँ बाँस फूलते हैं, यस पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली, 2011, पृष्ठ-70
7. वही, पृष्ठ-82, 83
8. वही, पृष्ठ-255
9. वही, पृष्ठ-86

विद्रोह, समर्पण और समाज

सुभाष कुमार गौतम

वरिष्ठ इतिहासकार सुधीर चन्द्र की पुस्तक ‘‘रख्माबाई स्त्री अधिकार और कानून’’ गुलाम भारत के समय की एक ऐतिहासिक घटना का विश्लेषण है यह बालविवाह जैसी सामाजिक कुरितियों के खिलाफ एक स्त्री के विद्रोह की कहानी है । सन् 1984 में रख्माबाई नामक स्त्री ने अपने पति के साथ रहने से इसलिए इन्कार कर दिया था क्योकि जिस समय उनकी शादी हुई उस समय वो अपरिपक्व थीं, जिसे वह विवाह नहीं मानती थी। ’‘रख्माबाई में एक साथ लक्षित ‘विद्रोह’ और ‘समर्पण’ में कानून, जनमानस और सामाजिक बदलाव के बीच सतत चलता कार्य-कारण सम्बंध देखा जा सकता है।’’ यह पुस्तक इन्हीं अनसुलझे सवालों की गुत्थी को समझने का माध्यम है। वहीं रख्माबाई और दादाजी भीकाजी के वैवाहिक जीवन के विवाद का लेखक ने बहुत बारीकी से समाजशास्त्रीय अध्ययन किया है। जब कोई व्यक्ति शोषण के खिलाफ आवाज उठाता है तो उसे उसकी कीमत चुकानी पडती है। स्त्री मुक्ति के इस संघर्ष में भी यही हुआ, बाल बिवाह जैसी कुप्रथा के खिलाफ आवाज उठाने वाली रख्माबाई को आहुति देनी पडी। वैसे तो यह विद्रोह शुरूआती दौर में सिर्फ रख्माबाई की अपनी समस्या से उपजा विद्रोह था पर धीरे धीरे वह पूरे हिन्दू समाज तथा अन्य समाज की स्त्रीयो से जुडे प्रश्न के रूप में सामने आया। रख्माबाई के मुकदमे में इतने पेंच थे कि वह दिन प्रति-दिन उलझता चला गया। लेखक देशी परम्पराओं और उपनिवेशीय कानून-व्यवस्था के संयुक्त दमन के विरोध में रख्माबाई के संकल्प को देखते है। जिस प्रकार समाज के संवेदनशील व्यक्ति को संवेदनशीलता की कीमत चुकानी पडती है। रख्माबाई ने जो भी कीमत चुकाई उसका आगे चल कर लाखों करोडों स्त्रीयों को लाभ मिला। 
इस पुस्तक में रख्माबाई का कम उनके और उनके पति दादाजी भीकाजी के बीच मुकदमे से जुडे सवालों का जिक्र अधिक किया गया है। आखिर रख्माबाई ने यह असाधारण विद्रोह क्यों किया इस प्रश्न पर विचार करने के लिए यह पुस्तक हमे विवश करती है। एक स्त्री होने के नाते उसे जिस प्रकार के कष्टों का सामना करना पडा था वो कितना असहनीय था, अगर उनके सौतेले पिता और नाना साथ न देते तो क्या हस्र हुआ होता। पति से अलग होने के बावजूद रख्माबाई अपने तथाकथित पति की मृत्यु के पश्चात एक विधवा का जीवन जीने लगती हंै। लेखक चुंकी गांधी दर्शन से प्रभावित व्यक्ति हैं इस लिए इस घटना को अपने उपसंहार में राम-राज से जोड कर देखते है, जो बात पाठक को खटक सकती है। रामायण की घटना का जिक्र करे तो हम देखते है कि सीता के समर्पण और त्याग अनदेखा करते हुए राम समाज के खातिर सीता को नहीं अपनाते है। रख्माबाई का विवाद उसे ठीक विपरित था। रख्माबाई का पति उसे जब अपने साथ ले जाना चाहता है उस समय रख्माबाई विद्रोह करती है और उसके साथ रहने से माना कर देती पर सवाल यह है कि आखिर उसकी मृत्यु के बाद वो विधवा का जीवन क्यो जीती है ? आखिर रख्माबाई ने पुनः विवाह क्यों नहीं किया? वहीं दूसरी ओर दादाजी भीकाजी ने समझौते के बाद एक दूसरी स्त्री से विवाह करने में जरा भी संकोच नहीं किया। इस पूरे प्रकरण को देखकर लेखक यह महसूस करते हैं कि कानून के सहारे सामाजिक समस्याएं नहीं सुलझ सकती। खास कर स्त्री पुरूष विवाद। लेखक का इशारा है कि सामाजिक समस्याओं का निदान हमें समाज में ही ढूंढना होगा। तथ्यों से भरपूर यह पुस्तक स्त्री विमर्शकारों के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी। वैसे मूल पुस्तक अंग्रेजी में है, यह हिन्दी अनुवाद है।

पुस्तक- रख्माबाई स्त्री अधिकार और कानून
लेखक- सुधीर चन्द्र
अईएसबीएन-978-81-267-2337-9
पेज-223
मूल्य- 400
प्रकाशन-राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली

स्त्री स्वाधीनता और आत्मनिर्भरता की कहानी

सुभाष कुमार  गौतम
सुचित्रा भट्टाचार्य का उपन्यास ‘छिन्नतार’ खास कर मध्यवर्ग को केंद्र में रख कर लिखा गया उपन्यास है। छिन्नतार का अर्थ टूटा हुआ तार होता है। यह उपन्यास टूटे हुए रिस्तों कि एक सशक्त गाथा है। यह बेहद ही दिलचस्प उपन्यास है। आज के समय में स्त्री विमर्श पर जो उपन्यास लिखे जा रहे है, उनमें स्त्री-पुरूष संबंध या त्रिकोंणीय प्रेम संबंध ही केंद्रीय विषय होता है। लेकिन ‘छिन्नतार’ उपन्यास इन सब से हट कर लिखा गया उपन्यास है। इस के केंद्र में मुख्यतः चार पात्र है दो स्त्री दो पुरूष। उपन्यास में लेखिका ने स्त्री चरित्र को बहुत ही सशक्त रूप में पेश किया है। स्त्री चरित्र में रिति और तापसी है। पुरूष पात्र शुभमय और सोमदत्त हैं। शुभमय और रिति के दाम्पत्य जीवन के इर्दगीर्द यह कहानी घूमती है। शुभमय पेशे से जज है। जो बेहद कर्तव्यनिष्ठ और अपने पेशे के प्रति इमानदार है। शुभमय और रिति दोनों कालेज के दिनों में एक दूसरे को पसंद करते है और आगे चलकर उनका प्रेम शादी में तब्दील हो जाता है जैसा की बांग्ला समाज में होता रहा है। दोनों का दंापत्य जीवन बहुत ही सुखी चल रहा होता है उनके घर में एक बेटी का जन्म होता है मगर यह खुशी ज्यादा दिन नहीं टिकती उनकी बेटी मुनिया की अचानक मृत्यु हो जाती है उनके जीवन में शोक के बादल छटने का नाम नहीं लेते उपर से डाक्टरी जांच में यह भी पता चल जाता की रिति कभी मां नही बन पाएगी। दुख्रः की तीखी चोट सहने के बाद, रिति कविता-लेखन की ओर दोबारा लौट आती है। अपनी मृत बेटी मुनिया को भूलने के लिए ही रिति कविता का सहारा लेती है। इसी बीच उसे धुम्रपान की लत भी पड़ जाती है। शुभमय के तबादले के तीन महीने बाद, रिति अचानक अपनी मां के पास कोलकाता चली जाती है। जहां उसने अपना बुटीक का कारोबार शुरू किया है। कोलकाता में उसके कुछ साहित्यिक दोस्त मीलते है। यह पडाव एक तरह से रिति के लिए दुखों की दुनिया से निकलने में सहायक सिद्ध होता है तो दुसरी तरफ शुभमय के लिए अकेलापन घातक सिद्ध होता है। शुभमय छ¨टे-से शहर में सरकारी क्वार्टर में रहने लगता है जहां वह बैरे, खानसामे अ©र च©कीदार¨ं के बीच एकाकी जीवन बिता रहा है। 

कोलकाता में रिति को अचानक अपने बुटीक के लिए स्थान बदलने का ख्याल आता है और उसे जब पैसों की जरूरत पडती है, तो वह शुभमय से पैसों की डिमान्ड करती है। शुभमय अभावग्रस्त होने के बावजूद रिति की मदद के लिए अपने भाईयों से पैसे की मांग करता है किन्तु वहां से उसे निराशा ही हाथ लगती है। उसूल¨ं पर चलनेवाले जज के रूप में मशहूर शुभमय को अपनी नैतिकता ताक पर रख कर चंद्रचूड जैसे भ्रष्ट वकील से पैसे उधार लेने पर मजबूर होना पड़ता है। इस उपन्यास में मौजूद घटनाक्रम से यह बात साफ जाहिर होती है कि न्यायालय जैसी संस्था को भ्रष्ट लोग कैसे प्रभावित करते है और जज को किस प्रकार गलत फैसलेे के लिए मजबूर कर देते है। इस पर संक्षिप्त प्रकाश डाला गया है। न्यायालय में मौजूद भ्रष्टाचार को बहुत ही अच्छे ढंग से लेखिका ने प्रस्तुत किया है। शुभमय के जीवन में इस घटना के बाद उथल-पुथल मच जाती है। एक ओर रिति कोलकाता में अपने बुटीक के बिजनेस को लेकर कुछ ज्यादा ही व्यस्त हो जाती है और दूसरी तरफ शुभमय एकाकीपन के चलते तापसी नामक गरीब युवती के करीब आ जाता है। तापसी एक बच्चें की मां है और उसका पति उसे छोड़ चुका है। जिससे शुभमय प्रेम करने लगता है। दूसरी तरफ कोलकाता में रिति का अपने कवि मित्र सोमदŸा के प्रति प्रेम पनपने लगता है। लेकिन इस उपन्यास का अंत कुछ इस प्रकार होता है कि सोमदŸा को छोड़कर तापसी वापस अपने मायके चली जाती है। दूसरी तरफ रिति सोमदŸा के संपर्क में आने के बाद ही  शुभमय की अहमियत को समझ पाती है कि उसके लिए वह कितना अनमोल है। और सोमदŸा को छोड़कर वापस अपने बुटीक के व्यवसाय में मसगूल हो जाती है। इसमें लेखिका ने स्त्री आत्मनिर्भरता के तरफ इशारा किया है जो स्त्रीस्वाधीतना का सबसे मजबूत पहलू है। यह उपन्यास पाठक और समाज के सामने बहुत सारे ऐसे प्रश्न छोड़ जाता है जो मध्यवर्गीय समाज के लिए आज विचारणीय है। छिंतार बांग्ला से हिंदी में अनुदित किया गया उपन्यास है। इसका अनुवाद सुशीला गुप्ता ने बहुत बारीकी से किया है।

उपन्यास-छिन्नतार
लेखिका- सुचित्रा भट्टाचार्य
पेज-288
मूल्य- 225
प्रकाशन-पेंगुइन प्रकाशन

कामरेड, कथाकार और आलोचक

सुभाष गौतम
कथाकार अरूण प्रकाश का जन्म बिहार के बेगूसराय जिले में निपनियां गांव में 22 फरवरी 1948 में हुआ था। माता का नाम कुंती देवी, जो पेशे से शिक्षिका थी, पिता रूद्रनारायण झा एक राजनीतिक व्यक्ति थे। अरूण प्रकाश आठ वर्ष के थे तो माता कुंती देवी का देहावसान हो गया था। उनके पिता सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव थे और 1968 में राज्यसभा सांसद हुए। अरूण प्रकाश की प्रारंभिक शिक्षा मंझौल से हुई थी। ग्रेजुएशन करने के लिए शाहपुर-पटोरी के आचार्य नरेन्द्रदेव महाविद्यालय में दाखिला लिए थे। पर बिमार होने के कारण पढाई पूरी नहीं कर पाए और बीच में ही पढ़ाई छोडनी पडी, फिर बेगूसराय के जी.डी. काॅलेज में केमेस्ट्री आॅनर्स में दाखिला लिया पर याहां भी सफलता हाथ नही लगी। सन् 1968 में पूसा इंस्टीट् यूट आॅफ मैनेजमेंट, दिल्ली से उन्होने होटल मैंनेजमेंट (स्नातक) में दाखिला लिया। उसी बीच उनके पिता की हत्या हो गई और अरूण प्रकाश पर संकट का पहाड टूट पडा। एक तरफ घर की जिम्मेदारी तो दुसरी तरफ कैरियर था। लेकिन यह संकट कुछ की समय में दूर हो गया जब उनहे नौकरी मिली। 1971 में होटल मैंनेजमेंट की पढ़ाई पूरी करेने के बाद दिल्ली स्थित होटल क्लेरिजेज में पहली नौकरी बेयरे के रूप में शुरू किया जिसे तीन माह में छोड कर लोदी होटल चले गए वहा भी बेयरे का काम किया। 1972 में पटना के  चले गये जहां होटल नटराज में अस्टिेंट मैंनेजर बन गये और वेटर की जिंदगी से मुक्ति मिल गई। पुनः एक साल वाद 1973 में बरौनी फर्टिलाइजर में असिस्टेंट मैनेजर की नौकरी मिल गई। मैनेजर होने के साथ बरौनी में सी. पी. आई. के मजदूर संगठन एटक के साथ मिलकर कुछ दिन बीड़ी मजदूरांे, कारखाना मजदूरों के लिए काम किया। 1986 में हिंदुस्तान फर्टिलाइजर में हिन्दी अधिकारी नियुक्त होर चैदह वर्ष वाद फिर दिल्ली आना हुआ और दिल्ली की संस्कृति में अरूण प्रकाश रच-बस गये। 1990 में हिंदुस्तान फर्टिलाइजर से वीआरएस लेकर पत्रकारिता के क्षेत्र में कूद पडे़ और दैनिक जागरण से एक पत्रकार के रूप में शुभरंभ किया, पर एक वर्ष में ही वाहा से नौकरी छोड दी और 1991 में राष्ट्रीय सहारा में कुछ माह नौकरी की फिर 1992-93 में समय-सूत्रधार पाक्षिक में वरिष्ठ सहायक संपादक रहे। 1993 से 2008 तक फ्रिलांसिग करते रहे यहीं नहीं वे जीवन के आखिरी दिनों में भी फ्रिलांसिग किया। 2004 से 2008 तक का साहित्य अकादमी की पत्रिका समकालीन भारतीय साहित्य के संपादक का सफर तय किया। 
अरूण प्रकाश ने लेखन की शुरूआत अंग्रेजी कविता से की थी, एक-दो कविताएं पटना के एक अंग्रेजी पत्र में प्रकाशित भी हुईं थी। उनका ये भी माना था कि कविता में वो सारी बाते नहीं कह सकते कहानी के माध्यम से वो सारी बाते कही जा सकती हैं। 1978 में ‘रक्त के बारे में’ पहली कविता पुस्तिका प्रकाशित हुई जो आखिरी दिनों में उनके बिस्तर पर तकिए के निचे देखने को मील जाती थी। उनकी पहली कहानी ‘छाला’ 1971 में ‘कहानीकार’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई जिसके लिए उन्हे 30 रूपए का पारिश्रमिक मनिआॅर्डर द्वार प्राप्त हुआ था। ‘छाला’ कहानी के प्रकाशित होने के बाद वे इतना उत्साहित हुए कि उसी वर्ष दो और कहानियां लिख ‘सनडे’ और ‘दोनांे तरफ’। ‘छाला’ कहानी का पात्र एक दफतर में काम करेने वाला निम्न दर्जे का कर्मचारी है। जो हमेशा अभाव में रहता है। सस्ते जूते पहनने के कारण उसके पाव में छाला पड जाता है। जिसके कारण वो पीडित है पर पदोन्नती का समाचार पाकर सारे दर्द भूल जाता है, और उस दिन वह दोगूना काम करदेता है। ‘सनडे’ कहानी असफलता और सफलता की दौड में मानवीय रिस्तों के खत्म होने की संभावनाओं की कहानी है। यह कहानी दो बेरोजगार दोस्त की है जब दोनों बेरोजगार अवस्था में रहते है तो हीरा-मोती की तरह एक दुसरे से गुथे रहते है, पर उनमें से एक दोस्त जब सफल हो जाता है। सफल होने वाला दोस्त कहता है कि अब तो सनडे को ही मिलाना होगा। इस कहानी में इन्हीं दो दोस्तों की समस्याओं और पीड़ा को उजागर किया गया है। इनमें से सबसे मजबुत कहानी ‘दोनों तरफ’ है जो पुरूष के नजर में स्त्री विषय को केंद्र में रख कर लिखी गई कहानी है। इन कहानियों में पूर्वी प्रदेश का पिछड़ा समाज खास कर साधारण-जन का प्रतिनिधत्व करते हैं। 1972 में दो कहानियां ‘सुनबहरी’ और ‘कुबड़े पेड’ प्रकाशित हुईं। सुनबहरी कहानी ठेठ गांव की पृष्ठभूमि से जुडी हुई कहानी है। इस कहानी में स्त्रीविमर्श का सशक्त रूप देखने को मिलता है। काहानी का पात्र ‘भजन’ रेलवे में पहरादार के रूप में काम करने वाला व्यक्ति है, जिसकी पगार 75 रूपए है। भजन की पगार इतनी कम और परिवार का खर्च इतना अधिक है वो हमेशा अभाव में रहता है। एक तरह से उसकी हालत नंगा क्या नहाए गा और क्या निचोडेगा की होती है। उसका पिता बिमार है जिसके दवा-दारू की नहीं जुटा पता उपर से उसकी मां अपने सूनबहरी (हाथ पाव सून्न होना) के दवा-दारू के लिए घर में तांडव मचा रखी है। वहीं अरूण प्रकाश ‘कुबड़े पेड’ कहानी लिखते समय गांव की पृष्ठभूमि से उठकर एकाएक दिल्ली शहर के करोल बाग पहुच जाते है। यह कहानी दिल्ली के करोल बाग स्थित एक दाम्पति की है, उनका जीवन पारिवारिक दायित्वों को पूरा करने में गुजर जाता है। कभी अपने बारे में गहराई से नही सोचते बस वो बडे़ होने का फर्ज निभाते रहते हैं। धीरे-धीरे उनके जीवन को निरसता ने घेर तेता है। सहज होने का प्रयास भी वे करते हैं मगर उनका जीवन उस कुबडे पेड़ की भांति है जिसमें फुनगियां तो निकल सकती है, मगर कोई बहुत बड़ा बदलाव नही आ सकता है। वे कुबडे पेड़ सरीके जीवन जीने केलिए अभिशप्त  हैं। इस कहानी में शहरी जीवन की सच्च देखने मिलता है।
उनकी काहानियों में जादूई यर्थाथ नहीं है वे वास्तविक समाज का दर्शन कराते है।  सच और सच्च के आसपस की कहानी को लिखते है। उनकी कहानीयों में किसी खास जाती का नहीं बल्कि पिछडे हुए समाज के लोगों प्रतिनिधत्व देखने को मिलता है। उनकी कहानियां 80 के दशक की देश काल परिस्थियों का साक्षात्कार करती हैं। अरूण प्रकाश जिन पात्रों की कहानी लिखते है वे हमें समाज में किसी न किसी रूप में देखने को मिल जाते है। उनकी कहानियों में यर्थाथ है वास्तविकता है। काल्पनिक आधार पर काहानियां नहीं लिखते थे। 1986 में प्रकाशित कहानी ‘‘बेला एक्का लौट रहीं है’’ एक आदिवासी महिला के संघर्ष की कहानी है, स्त्री समाज में हमेशा से ही पीडि़त व शोषित रही है। वह अपने जन्म से लेकर मृत्यु तक मुश्किले उठाती है। वह सम्मान से जीना चाहती है। वह आत्मनिर्भर होना चाहती है। वह पढ़ना चाहती है, मगर उसे अपने घर से ही विद्रोह का सामना करना पड़ता है। बोला एक्का भी अपनी शिक्षा के दौरनान पिता की उपेक्षा छेलती महिला है। आरक्षण हो या जातिगत आरक्षण वह अपने लिए सम्मान चाहती है। कहानी की पात्र बेला एक्का नौकरी करने बेगूसराय जातीं हैं तो अपनी नैतिकता को बचाने का हस संभव प्रयास करती हंै, मगर यह पुरूष प्रधान समाज की घृणित मानसिकता के चलते उसे नौकरी से इस्तिफा देना पड़ता है। शिक्षा के प्रति मिस बेला एक्का के पिता की उदासीनात से यह बात खुलकर सामने आती है कि किस प्रकार दलित, पिछणी जाति के लोगों को कदम-कदम पर अपमान का घंूट पीना पड़ता है। वे कितने ही पढ़ लिख जाए, अधिकारी बन जाए, जति का दंश उन्हे हर हाल में झेलना पड़ता है। उन्हें हर पल अपने सम्मान व स्वभिमान के साथ समझौता करना पडता है। जो नहीं समझौता करते उन्हें पद छोडना पडता है। इस कहानि में बेला एक्का समझौता नहीं करती और अपने सम्मान व स्वाभिमान को बचाने के लिए नौकरी छोड़ देती है। इस कहानी में स्त्री अस्मिता के प्रश्न को जोरदार तरीके से उठाया है।
अरूण प्रकाश की सबसे चर्चीत कहानी 1985 में प्रकाशित ‘‘भैया एक्सप्रेस’ है। यह कहानी पूरबिया लोगों का प्रतिनिधित्व करती है। भैया एक्सप्रेस बिहार और पूर्वी-उत्तर प्रदेश की कहानी है। इस क्षेत्र के लोग ज्यादातर अपनी रोजी-रोटी की तलाश में पंजाब प्रेदश में काम करने जाते है, इन प्रदेशों में काम करने के पीछे एक और महत्वपूर्ण बात कि यहां नगद मजूरी मीलती है। इस कहानी में रामदेव नामक अपने भाई को खोजने जाता है तो पंजाब गया रहा है। रामदेव जिस समय पंजाब जाता है उस समय पंजाब में अशांति का वतावरण रहता है। यह कहानी एक पूरबीयां भैया/मजूर का यात्रा वृतांत है। 1988 में ‘जल-प्रान्तर’ कहानी आई जो रिपोर्तार्ज की शैली में लिखी गई है। बाढ़ का इतना सुक्षम और हृदय बिदारक वर्णन अभी तक किसी ने नहीं किया है। इस कहानी को पढते हुए लगता है जैसे कि पाठक स्वयं बाढ में घिर गया है। इस कहानी में अरूण प्रकाश की वाम विचाधारा की भी सोंधी महक भी मिहलती है। उनकी सबसे अंतिम दो कहानी ‘कम गोबर’ और ‘स्वर्ग का पता’ ‘‘बया’’ पत्रिका के अप्रैल-जून 2012 के बिषेश अंक में प्रकाशित हुई। कम गोबर कहानी दो राजपूत भाईयों के बिच जमीन बटवारे और प्रगति कि कहानी है। दो भाईयों में एक दिवाकर पढ़ा-लिखा और दूसरा केदार कम पढ़ा-लिखा इंशान है। पढ़ा-लिखा दिवाकर इस घमण्ड में किसानी का काम नहीं करता क्यों कि उसे लगता कि मैं तो पढ़ा-लिखा हूं, यह काम अनपढ़ों का है। केदार इसके बिपरीत है, वह खेती-बाड़ी का सारा काम स्वयं करता है और प्रगति कर जाता है। यह कहानी हरिशंकर परसाई की शैली में लिखी गई कहानी है। जिसमें व्यंग्य और प्रहसन के माध्यम से गांव के दो परिवारों की स्थिति को दिखाया है। ‘स्वर्ग का पता’ कहानी मानव विकास की चरम अवस्था को ध्यान में रख कर लिखी गई कहानी है। इस कहानी में यह दिखाया गया है कि मानव जब सभी भौतिक सुख-सुविधाओं को भोग लेगा, विकास की सारी यात्राएं पूरी कर लेगा तो फिर क्या बचे गा। इन्ही सवालों को केंद्र में रख कर लिखी गई कहानी है-‘‘मोक्ष और स्वर्ग की बात सुन-सुनकर मांगुर को लगता कि वह भी जल्दी स्वर्ग पहुंच जाता तो अच्छा था। लेकिन मांगुर मर नहीं रहा था। वह अपना भोजन अब भी जुटा लेता था। तैरने से नियमित व्यायाम हो जाता था। इसलिए मांगुर का स्वास्थ्य अच्छा था। एक बात और थी कि मांगुर को मरना नहीं आता था अब बगै़र मरे तो स्वर्ग जाया नहीं जा सकता था....’’ इस कहानी में दो दोस्त होते है झिंगुर और मांगुर, झिंगुर मर जाता है। पृथ्वी पर यह अफवाह रहती है कि स्वर्ग में बहुत मजे हैं। वहा कुछ करना नहीं पडता सोचते ही सब सामने हाजिर हो जाता है। इसी लालच में मांगुर भी कैसे-कैसे जुगाड से मर जाता है पर जब वह मृत लोक में मृत लोगों से मिलता है तो उसे बहुत निराशा होती है। क्यों कि मरे हुए सभी लोग स्वर्ग का पता ढूंढ रहें है। फिर वो निराश होकर पृथ्वी पर आना चाहता है। अरूण प्रकाश ने कुल मिलाकर लगभग 40 कहानियां लिखीं हैं।
 अरूण प्रकाश क्या साहित्य, क्या पत्रकारिता, क्या फिल्म हर फिल्ड के एक धुरंधर खिलाड़ी थे, वे परफेक्सन (संपूर्णता) पर बहुत जोर देते थे। महत्वपूर्ण टीवी सिरियल ‘युग’ और ‘चंद्रकांता’ के लिए पटकथा लेखन का काम किया। उनके द्वारा लिखी गई कहानी-संग्रहः भैया एक्सप्रेस (1992), जल-प्रांतर (1994), लाखों के बोल सहे (1995), मँझधार किनारे (1996), विषम राग (2003), स्वपन-घर (2006) प्रकाशित हैं। उनका उपन्यास कोंपल-कथा (1991) में प्रकाशित है। अरूण प्रकाश कथाकार, उपन्यासकार, कवि, अनुवादक, पटकथा-लेखक होने के साथ-साथ एक बहुत ही सुक्षम दृष्टि वाले आलोचक भी थे। इस बात का प्रमाण आप को उनकी 2012 में प्रकाशित पुस्तक ‘‘गद्य की पहचान’’ से मीलती है। यह अपने ढंग की आलोचना की मात्र पुस्तक है जिसमें जेनर और फार्म को लेकर अरूण प्रकाश में अदभूत काम किया है। इसके आलावा एक आलोचाना की पुस्तक ‘‘उपन्यास के रंग’’ के साथ-साथ अन्य पुस्तकें प्रकाशनाधीन है। अरूण प्रकाश पिछले चार साल से श्वास की बिमारी से ग्रस्त जो 18 जून 2012 को भैया एक्सप्रेस के लेखक भैया (पूरबिया) चले गये।

Monday, November 26, 2012






दरिद्रता खत्म हो गयी होती तो दीपावली भी नहीं होती






डॉ.नामवर सिंह से बात चित पर आधारित यह लेख प्रभात खबर पटना संकरण में १३ नवंबर २०१२ छपा था.


हमारे जितने त्योहार है, उनमें एक कड़ी सी है. रक्षाबंधन पहला त्योहार है. रक्षाबंधन का संबंध पुरोहित वर्ग व ब्राह्मणों से माना गया है. बाद में इस त्योहार को स्वाधीनता संग्राम से जोड़ा गया था. बंगाल में लोग एक-दूसरे को राखी बांध कर युद्ध के मैदान में भेजते थे. स्त्रियां और बहनें राखी बांधती थीं. युद्ध के मैदान में जब कोई घर का सदस्य जाता था, तो बहनें उसे राखी बांधती थीं. राखी के बाद दूसरा त्योहार आता है विजयादशमी. इस त्योहार से अनेक किंवदंतियां और कहानियां जुड़ी हैं. हमारे यहां इन त्योहारों को जाति-वर्ण व्यवस्था से भी जोड़ दिया गया है. रक्षाबंधन ब्राह्मणों का और विजयादशमी क्षत्रियों का त्योहार माना जाता है.


दीपावली प्रकाश का पर्व माना जाता है. इसे लक्ष्मी से जोड़ कर भी देखा जाता है, क्योंकि आमतौर पर वणिक समाज दीपावली के दिन खूब खरीदारी करते हैं. वणिक वर्ग वाणिज्य-व्यवसाय करने वाले लोगों का है. इसलिए आमतौर पर दुकानों में, जहां उनका व्यवसाय होता है, दीये जलाये जाते हैं.


त्योहारों के इस क्रम में देखें तो आगे चल कर होली मनायी जाती है. होली एक तरह से नये वर्ष का शुभारंभ है. होली के बाद नया वर्ष शुरू होता है.


हमारे यहां मुख्यत: चार त्योहार हैं. यह ऋतुओं के अनुसार हैं. जैसे वर्षा बीती तो उसके बाद सर्दी आ जाती है. जब सर्दी समाप्त होती है, तो वसंत होता है, गर्मी आने लगती है. होली वसंत का त्योहार है. होली सबका त्योहार है, क्योंकि इसे जाति-वर्ण व्यवस्था के आधार पर शूद्र वर्ण के साथ जोड़ कर देखा जाता है. यह सब परंपराओं से चला आ रहा है, लेकिन सब मनाते है कि यह सबका त्योहार है.


वसंत पंचमी को सरस्वती के साथ जोड़ दिया गया है. यह ब्राह्मणों का त्योहार माना गया है. वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाये, तो यह ऋतु परिवर्तन के साथ भी जुड़ा है.


इन पवरें के पीछे किंवदंतियां और कथाएं जोड़ दी गयी हैं, लेकिन उनका एक प्राकृतिक आधार भी है. विश्‍व में कुछ देश ऐसे भी हैं, जहां दो ही ऋतुएं होती हैं. सर्दी या गर्मी, लेकिन हमारे यहां जो माना जाता है, और जो कल्पना की गयी है, उसके अनुसार बारह माह और छह ऋतुओं का वर्णन किया गया है. बहुत सारा साहित्य ऋतुओं के बारे में लिखा गया है. उस क्रम में दीपावली का भी वर्णन आता है. दीपावली के दिन कुछ लोग लक्ष्मी पूजन करते हैं, तो कुछ जुआ भी खेलते हैं. ये सारी चीजें आपस में जुड़ी हुई हैं.


कुल मिला कर वर्षा ऋतु समाप्त होने के बाद हर आदमी अपने घर में एक बार दीप प्रज्वलन का काम करता है. इसका एक वैज्ञानिक आधार भी है. हमारे देश में 26 जनवरी को राष्ट्रीय त्योहार के रूप में मनाया जाता है. हमारा प्रशासन इसे प्रकाश पर्व के रूप में मनाता है. गणतंत्र दिवस के दिन पार्लियामेंट से लेकर राष्ट्रपति भवन तक प्रकाश होता है. प्रकाश पर्व एक तरह से उल्लास का पर्व है. राजनीतिक जीवन में देखें, तो आमतौर से यह पर्व आर्थिक, राजनीतिक स्थिति के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है. आर्थिक संकट के दौर में भी हम इसे प्रतीक के रूप में देख सकते हैं. हमारे जीवन में जो परिवर्तन आते हैं, उनके साथ ही हमारे त्योहारों का स्वरूप भी बदल जाता है. उन परिवर्तनों के संदर्भ में भी दीपावली को देख सकते हैं.


हमारा देश आर्थिक व राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रहा है. उदारीकरण के कई प्रस्ताव आ रहे हैं, जिनके कारण स्थितियां बदलेंगी. हमारे देश में व्यक्तिगत पूंजीवाद का बहुत विकास हुआ है. न जाने कितनी कंपनियां लोगों ने खोली हैं. पहले हमारे यहां कुछ गिने-चुने उद्योग घराने होते थे. आज उनके अलावा भी बहुत ब.डे-ब.डे पूंजीपति पैदा हो गये हैं. बहुराष्ट्रीय कंपनियों का भी हमारे यहां दखल बढ.ा है. अनेक राजनीतिक नेता इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों से जु.डे हैं.


आजादी के पहले और बाद में जिस समाजवादी ढांचे की हमने कल्पना की थी, वह कल्पना ही रह गयी है. उसके समानांतर देखें, तो सरकार के पास जो भी पूंजी है, उसे कल्याणकारी काम में कितना लगा रही है, वह काम हो रहे हैं या नहीं, यह विचारणीय है, क्योंकि उस मात्रा में गरीबी का उन्मूलन नहीं हो सका है. हमारे देश में पढे.-लिखे बेकारों की संख्या लगातार बढ. रही है. बेकारों की एक फौज खड़ी हो गयी है. जिस गरीबी के उन्मूलन का संकल्प लिया था, वह दूर नहीं हो रही है. ऐसे में गरीबों के लिए दीपावली के क्या मायने होंगे?


देश में ध्रुवीकरण हो रहा है. एक ओर ब.डे-ब.डे पूंजीपति तैयार हो रहे हैं, दूसरी ओर झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या भी तेजी से बढ. रही है. यह जो दो छोर दिखाई दे रहे हैं, यह एक नया अर्थतंत्र है. इस अर्थतंत्र को हम लोग अपनी पुरानी परंपरा से जोड़ कर देखें, तो एक ओर बिजली की चमक-दमक वाले मकान होंगे, दूसरी ओर झुग्गी-झोपड़ियां, जहां दिया जलाने के लिए तेल भी नहीं होगा. अमीरी-गरीबी का यह फासला लगातार बढ.ता जा रहा है. ऐसी ही स्थितियों में विद्रोह पैदा होता है. यह स्थिति ज्यादा दिन चलनेवाली नहीं है. दीपावली के दिन यदि शहर का चक्कर लगाया जाये, तो फर्क मालूम हो जायेगा कि दीपावली कहां-कैसे मनायी जा रही है.


दीपावली का साहित्य से बड़ा गहरा संबंध है. महादेवी वर्मा, दीपशिखा महादेवी वर्मा कहलाती हैं. उन्होंने दीप पर बहुत अच्छे गीत व कविताएं लिखी हैं. महादेवी ही नहीं, अधिकतर कवियों ने दीपक को अपने जीवन का प्रतीक माना है. प्रकाश का अंधकार से संघर्ष जारी है. निराला जी की कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ एक सिद्ध कविता है, जो रावण के विरुद्ध राम के संघर्ष को दर्शाती है.


हमारे यहां दरिद्र-खेदन की परंपरा रही है, जिसको आज नया अर्थ दिया जा सकता है. दरिद्रता चली गयी होती, तो दीपावली का त्योहार भी खत्म हो गया होता. यह इस बात का सूचक है कि आज भी हम अपने घर से दरिद्रता दूर करने का प्रयास कर रहे हैं. महानगरों में यह त्योहार संपत्ति व वैभव के प्रदर्शन का सूचक है. छोटे व्यवसायियों की आमदनी भी इससे जुड़ी हुई है. शहरों में लोग बल्ब जलाते हैं, दीये का प्रचलन खत्म हो रहा है. दीपक और बल्ब में फर्क है. अमीर व गरीब का. संस्कार व असंस्कारी लोगों का. दीपावली को मानदंड मान लिया जाये, तो समाज में विभित्र वगरें का फर्क मालूम होता है. समाज में कितने स्तर है, यह मापक है संपत्ति का.


(सुभाष गौतम से बातचीत पर आधारित)हमारे जितने त्योहार है, उनमें एक कड़ी सी है. रक्षाबंधन पहला त्योहार है. रक्षाबंधन का संबंध पुरोहित वर्ग व ब्राह्मणों से माना गया है. बाद में इस त्योहार को स्वाधीनता संग्राम से जोड़ा गया था. बंगाल में लोग एक-दूसरे को राखी बांध कर युद्ध के मैदान में भेजते थे. स्त्रियां और बहनें राखी बांधती थीं. युद्ध के मैदान में जब कोई घर का सदस्य जाता था, तो बहनें उसे राखी बांधती थीं. राखी के बाद दूसरा त्योहार आता है विजयादशमी. इस त्योहार से अनेक किंवदंतियां और कहानियां जुड़ी हैं. हमारे यहां इन त्योहारों को जाति-वर्ण व्यवस्था से भी जोड़ दिया गया है. रक्षाबंधन ब्राह्मणों का और विजयादशमी क्षत्रियों का त्योहार माना जाता है.


दीपावली प्रकाश का पर्व माना जाता है. इसे लक्ष्मी से जोड़ कर भी देखा जाता है, क्योंकि आमतौर पर वणिक समाज दीपावली के दिन खूब खरीदारी करते हैं. वणिक वर्ग वाणिज्य-व्यवसाय करने वाले लोगों का है. इसलिए आमतौर पर दुकानों में, जहां उनका व्यवसाय होता है, दीये जलाये जाते हैं.


त्योहारों के इस क्रम में देखें तो आगे चल कर होली मनायी जाती है. होली एक तरह से नये वर्ष का शुभारंभ है. होली के बाद नया वर्ष शुरू होता है.


हमारे यहां मुख्यत: चार त्योहार हैं. यह ऋतुओं के अनुसार हैं. जैसे वर्षा बीती तो उसके बाद सर्दी आ जाती है. जब सर्दी समाप्त होती है, तो वसंत होता है, गर्मी आने लगती है. होली वसंत का त्योहार है. होली सबका त्योहार है, क्योंकि इसे जाति-वर्ण व्यवस्था के आधार पर शूद्र वर्ण के साथ जोड़ कर देखा जाता है. यह सब परंपराओं से चला आ रहा है, लेकिन सब मनाते है कि यह सबका त्योहार है.


वसंत पंचमी को सरस्वती के साथ जोड़ दिया गया है. यह ब्राह्मणों का त्योहार माना गया है. वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाये, तो यह ऋतु परिवर्तन के साथ भी जुड़ा है.


इन पवरें के पीछे किंवदंतियां और कथाएं जोड़ दी गयी हैं, लेकिन उनका एक प्राकृतिक आधार भी है. विश्‍व में कुछ देश ऐसे भी हैं, जहां दो ही ऋतुएं होती हैं. सर्दी या गर्मी, लेकिन हमारे यहां जो माना जाता है, और जो कल्पना की गयी है, उसके अनुसार बारह माह और छह ऋतुओं का वर्णन किया गया है. बहुत सारा साहित्य ऋतुओं के बारे में लिखा गया है. उस क्रम में दीपावली का भी वर्णन आता है. दीपावली के दिन कुछ लोग लक्ष्मी पूजन करते हैं, तो कुछ जुआ भी खेलते हैं. ये सारी चीजें आपस में जुड़ी हुई हैं.


कुल मिला कर वर्षा ऋतु समाप्त होने के बाद हर आदमी अपने घर में एक बार दीप प्रज्वलन का काम करता है. इसका एक वैज्ञानिक आधार भी है. हमारे देश में 26 जनवरी को राष्ट्रीय त्योहार के रूप में मनाया जाता है. हमारा प्रशासन इसे प्रकाश पर्व के रूप में मनाता है. गणतंत्र दिवस के दिन पार्लियामेंट से लेकर राष्ट्रपति भवन तक प्रकाश होता है. प्रकाश पर्व एक तरह से उल्लास का पर्व है. राजनीतिक जीवन में देखें, तो आमतौर से यह पर्व आर्थिक, राजनीतिक स्थिति के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है. आर्थिक संकट के दौर में भी हम इसे प्रतीक के रूप में देख सकते हैं. हमारे जीवन में जो परिवर्तन आते हैं, उनके साथ ही हमारे त्योहारों का स्वरूप भी बदल जाता है. उन परिवर्तनों के संदर्भ में भी दीपावली को देख सकते हैं.


हमारा देश आर्थिक व राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रहा है. उदारीकरण के कई प्रस्ताव आ रहे हैं, जिनके कारण स्थितियां बदलेंगी. हमारे देश में व्यक्तिगत पूंजीवाद का बहुत विकास हुआ है. न जाने कितनी कंपनियां लोगों ने खोली हैं. पहले हमारे यहां कुछ गिने-चुने उद्योग घराने होते थे. आज उनके अलावा भी बहुत ब.डे-ब.डे पूंजीपति पैदा हो गये हैं. बहुराष्ट्रीय कंपनियों का भी हमारे यहां दखल बढ.ा है. अनेक राजनीतिक नेता इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों से जु.डे हैं.


आजादी के पहले और बाद में जिस समाजवादी ढांचे की हमने कल्पना की थी, वह कल्पना ही रह गयी है. उसके समानांतर देखें, तो सरकार के पास जो भी पूंजी है, उसे कल्याणकारी काम में कितना लगा रही है, वह काम हो रहे हैं या नहीं, यह विचारणीय है, क्योंकि उस मात्रा में गरीबी का उन्मूलन नहीं हो सका है. हमारे देश में पढे.-लिखे बेकारों की संख्या लगातार बढ. रही है. बेकारों की एक फौज खड़ी हो गयी है. जिस गरीबी के उन्मूलन का संकल्प लिया था, वह दूर नहीं हो रही है. ऐसे में गरीबों के लिए दीपावली के क्या मायने होंगे?


देश में ध्रुवीकरण हो रहा है. एक ओर ब.डे-ब.डे पूंजीपति तैयार हो रहे हैं, दूसरी ओर झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या भी तेजी से बढ. रही है. यह जो दो छोर दिखाई दे रहे हैं, यह एक नया अर्थतंत्र है. इस अर्थतंत्र को हम लोग अपनी पुरानी परंपरा से जोड़ कर देखें, तो एक ओर बिजली की चमक-दमक वाले मकान होंगे, दूसरी ओर झुग्गी-झोपड़ियां, जहां दिया जलाने के लिए तेल भी नहीं होगा. अमीरी-गरीबी का यह फासला लगातार बढ.ता जा रहा है. ऐसी ही स्थितियों में विद्रोह पैदा होता है. यह स्थिति ज्यादा दिन चलनेवाली नहीं है. दीपावली के दिन यदि शहर का चक्कर लगाया जाये, तो फर्क मालूम हो जायेगा कि दीपावली कहां-कैसे मनायी जा रही है.


दीपावली का साहित्य से बड़ा गहरा संबंध है. महादेवी वर्मा, दीपशिखा महादेवी वर्मा कहलाती हैं. उन्होंने दीप पर बहुत अच्छे गीत व कविताएं लिखी हैं. महादेवी ही नहीं, अधिकतर कवियों ने दीपक को अपने जीवन का प्रतीक माना है. प्रकाश का अंधकार से संघर्ष जारी है. निराला जी की कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ एक सिद्ध कविता है, जो रावण के विरुद्ध राम के संघर्ष को दर्शाती है.


हमारे यहां दरिद्र-खेदन की परंपरा रही है, जिसको आज नया अर्थ दिया जा सकता है. दरिद्रता चली गयी होती, तो दीपावली का त्योहार भी खत्म हो गया होता. यह इस बात का सूचक है कि आज भी हम अपने घर से दरिद्रता दूर करने का प्रयास कर रहे हैं. महानगरों में यह त्योहार संपत्ति व वैभव के प्रदर्शन का सूचक है. छोटे व्यवसायियों की आमदनी भी इससे जुड़ी हुई है. शहरों में लोग बल्ब जलाते हैं, दीये का प्रचलन खत्म हो रहा है. दीपक और बल्ब में फर्क है. अमीर व गरीब का. संस्कार व असंस्कारी लोगों का. दीपावली को मानदंड मान लिया जाये, तो समाज में विभित्र वगरें का फर्क मालूम होता है. समाज में कितने स्तर है, यह मापक है संपत्ति का.


सुभाष गौतम







     

Monday, October 15, 2012


कामरेड अरूण प्रकाश का जाना 
सुभाष गौतम
कथाकार अरूण प्रकाश जी से मेरी मुलाकात जून 2011 में हुई थी। एक बात-चीत के सिलसिले में मेरा उनके घर जाना हूआ था। बात-चीत का विषय ‘बेगूसराय का आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक इतिहास’ था। अरूण प्रकाश से बात-चीत के लिए मैं नंदीग्राम डायरी के लेखक पुष्पराज जी के आग्रह पर गया था। पहुंच कर मैं बरामदे में बैठा थोडे देर बैठने के बाद, कमरे से कथाकार अरूण प्रकाश निकले और सामने वाली कुर्सी पर आ बैठे, नाक में आक्सीजन की नली लगी थी। मैंने उनसे बात-चीत शुरू की, तकरीबन तीन घंटे तक वो लगातार बात करते रहे। उस दिन उन्हांेने बेगूसराय बिहार के बारे में एक से एक रोचक जानकारी दी। यहां तक कि छोटे-छोटे उद्योग-धंधे, व्यवसाय आदि की बहुत सी बाते बताई, कुछ जानकारियां तो ऐसी दी कि जो इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं मिलती। मझौल के बारे में उन्होने बताया कि मझौल में एक नील कोठी थी। उसमें एक नीलहा रहता था जो कोई भारतीय नील कोठी के सामने से गुजरता वो अपना छाता बन्द कर लेता, अगर तांगा गाडी गुजरता था तो उस में सवार सभी लोग उतर कर पैदल चलते थे। आज की नयी पीढ़ी को यह मालूम ही नहीं कि उस कोठी के सामने से उनके माता-पिता, दादा-दादी सिर झुका के गुजरा करते थे। उस दिन हमारी बात-चीत सफल रही उसके बाद हम मित्र कब बन गये पता नहीं चला। जहां तक मुझको याद है कि विश्वनाथ त्रिपाठी की पुस्तक ‘‘व्योमकेश दरवेश’’ पर एक लेख लिखवाया, वो लेख उनका आखिरी था उसके बाद उन्होने कोई लेख आदि नहीं लिखा था। 
एक दिन उन्होंने बताया कि जीवन का ज्ञान प्राप्त करने के लिए एक स्रोत साहित्य भी है, लेकिन यदि लेखक के पास ज्ञान कम होतो ऐसी स्थिति में पाठक तक ज्ञान कैसे पहुंचेगा। अभी हाल ही में मेरे जवान बेटे मनु प्रकाश ने कहा कि मेरे पास जीवन का ज्ञान बहुत कम है। इसका प्रसंग तब निकला जब उसने बताया कि वह तैराकी सीखने जा रहा है। बरौनी में रहता तो वह तैराकी अपने आप सीख जाता। यहां दो-दो नदीयां हैं। गंगा और बया लेकिन दिल्ली की सड़ी हुई यमुना में यह संभव नहीं। शहरी जीवनशैली कुछ ऐसी है कि आदमी अपने तक सिमट कर रह जाता है। फ्लैटों की जिंदगी में जीवन के पर्यावारण से सीधा संपर्क बहुत कम हो पाता है। अरूण जी छोटे-बड़े, स्त्री-पुरूष में भेद नहीं रखते थे सबकों समान भाव से देखते थे। वो हर किसी के कास को सराहते थे चाहे वह समाज का छोटा से छोटा आदमी क्यों न हो। अरूण जी बेहद सहज और सरल स्वभाव के इंसान थे, कोई भी उन से मिलने के बाद उनका मूरीद हो जाता। वो बहुत ही जिवट इंसान थे। विकट परिस्थितियों में भी विचलित होने वाले नहीं थे। मैं सप्ताह में तीन से चार दिन उनसे मिलने जाता मुझे प्यार से हनुमान कहते क्यों कि जब भी वो फोन करते मैं हाजिर हो जाता। उनके यहां जैसे पहुँचता वो कहते- तो बताईये क्या खबर लाए है साहित्य जगत की’ आये दिन किसी ना किसी नए विषय पर हमारी चर्चा होती। जिस दिन उनको बात करने का मन नहीं होता तो  कहते आज कुछ संगीत हो जाए, हम गाना सुनाते और वह मेज बजाते फिर देर रात घर लौटता। मैं उन्हें एक साहित्यकार के रूप में नहीं एक व्यक्ति के रूप में जानता था।
मार्कसवाद के विषय में वो कहा करते थे कि -समाजसेवा और क्रांतिकारी काम भविष्योन्मुखी होता है, जनता उसको लेकर दूरगामी स्वपन देखती है। लेकिन यदि जनता को तात्कालिक तकलीफ है तो उसे रिलीफ भी तात्कालिक चाहिए। माक्र्सवाद जैसा व्यवहारिक दर्शन यथार्थवाद है जो दार्शनिक स्वप्न देखता है। अंधविश्वास और विश्वास जैसी श्रद्धा नहीं  तार्किक सहमति होनी चाहिए। अरूण जी ने जीवन के आखिरी दिनों में भी ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं किया क्योकि वो अन्य वामपंथीयों की तरह नहीं थे। उन्हें विचारधारा की बहुत अच्छी समझ थी। उनके लेखन में भी विचारधारा की झलक मिलती है। एक दिन उन्हांेने पूछा कि तुम क्या बनना चाहते हो? मैंने कहा कि एक अच्छा इंसान बनना चाहता हूं। इस बात पर वे बोले कि एक अच्छा इंसान बनना कोई मुश्किल काम नहीं है। लेकिन अच्छा बनने के बाद अच्छा बना रहना बड़ी बात है। साहित्य जगत के किसी भी लेखक की उन्होने कभी भूल कर भी निन्दा नही की। अरूण जी साहित्य जगत में ऐसे व्यक्ति थे जिनकी अगर कोई आलोचना भी करता तो वो पलट कर जवाब नहीं देते थे। हिंदी के आलोचक प्रो. नामवर सिंह जी के विषय में हमेशा पूछते उनकी तारीफ भी करते थे। पर नामवर जी से उनकी एक शिकायत थी। अरूण जी कहते थे कि ‘नामवर जी ने मेरी रचानाओं पर कभी भूल से भी आलोचना या तारीफ नहीं की होगी। कहीं न कहीं ये कसक उनके मन में थी कि नामवर जी उनकी रचनाओं पर कभी टिप्पणी नहीं किए। 
अस्वस्थ होने के बावजूद भी उन्होने पिछले दिनों ‘गद्य की पहचान’ नाम से एक आलोचनात्मक पुस्तक लिखी। इस आलोचनात्मक पुस्तक के संबन्ध में बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि ‘इसको लिखने के पीछे एक रोचक तथ्य मेरे सामने था। आत्मकथात्मक उपन्यास जैसा एक शब्द आया। जिस पर वे विचार करने लगे। आत्मकथा और उपन्यास दोंनों अलग संरचनाएं हैं। दोनों में से आखिर कौन अधिक महत्वपूर्ण है? किसका असर अधिक होगा? दोनों में से कौन अधिक प्रभावशाली है? इन्हीं विचारों व सवालों को जानने की मनसा से उन्होंने अध्य्यन शुरू किया। इसी क्रम में अध्ययन करते हुए उनके मन में प्रायः यह सवाल उठने लगते, आलोचना किस के लिए होती है? यह कैसी होनी चाहिए? यह सामान्य पाठक के लिए होनी चाहिए या विशिष्ठ वर्ग के लिए। यह अक्सर विशिष्ठ वर्ग के लिए होती है। अकादमिक क्षेत्र के पाठक भी इसमें आ जाते है। आलोचना का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए। प्रारंभिक सूचना क्षेत्र, दीर्घ आलोचना, लघु आलोचना जैसी विधाएं कहानी और उपन्यास से पिछे रह गयी हैं जिन पर लिखा जाना चाहिए। इसमें व्यवस्थित रूप से कार्य होना अभी बाकी है। यह मनोरंजक तरकीब से लिखा हुआ होना चाहिए जिसको पढ़ने पर पाठक को आन्नद आये। इन्हीं विचारों के चलते उन्होंने ‘गद्य की पहचान’ लिखा। उनका हृदय उस वक्त गदगद हो उठा जब विश्वनाथ त्रिपाठी जी ने फोन पर उन्हें बधाई देते हुए कहा कि उनकी आलोचनात्मक पुस्तक वाकई काबिले तारीफ है यह अपने आप में एक जन जागरण है। उनकी पुस्तक ‘गद्य की पहचान’ लिखने के पश्चात वो बेहद अस्वस्थ रहने लगे थे। मई 2012 के अंत में वो जब हास्पीटल में थे उस समय हम उनसे मिलने गये थे। उन्होंने मेरे हास्पीटल पहंुचते ही कहा कि हनूमान शुक्रवार पत्रिका की दो काॅपी का इंतजाम करों मैं झट उठा और दो काॅपी पत्रिका लेकर आ गया। उन्होने अपने जेब से 20 रू निकाल कर दिए और बोले कि जो सबसे अधिक अक्रामक तेवर वाला व्यक्ति है वहीं समीक्षा पढ कर सुनाएगा । वहां पर मौजूद सभी लोग एक दूसरे की ओर देखने लगे। फिर उन्होनें पत्रिका को रंजना के तरफ बढ़ाते हुए कहा कि पढ़ों। रंजना ने पत्रिका में छपी समीक्षा को पढना शुरू किया उस समय हास्पीटल का वो कमरा एकदम शांत हो गया था। समीक्षा का पाठ खत्म होने के बाद उन्होने समीक्षक और संपादक की तारीफ की और कहा कि समीक्षा अच्छी है। 18 जून 2012 को दोपहर एक बजे दिल्ली के पटेल चेस्ट हास्पीटल में उनका देहावसान हो गया और अपने पीछे छोड़ गये अपनी साहित्यिक संपदा। 

Sunday, June 17, 2012


जनांदोलन की पत्रकारिता का महत्व
सुभाष गौतम
‘‘चर्चीत पुस्तक ‘नंदीग्राम डायरी’ के लेखक एवं जनांदोलनांे की पत्रकारिता करने वाले युवा पत्रकार ‘पुष्पराज’ की सुभाष गौतम से बातचीत। पुष्पराज उन पत्रकारो में से एक हैं जो पत्रकारिता पेशे के लिए नहीं सामाज परिवर्तन के लिए करते है।’’
प्रश्न- पुष्पराज जी आप जनांदोलनों की खबरें लिखते रहे हैं। आप वर्तमान समय  में जनआंदोलन और मीडिया की भूमिका को किस रूप में देखते हैं ?
पुष्पराज- मीडिया का मतलब ‘माध्यम’ होता है। आज मीडिया का मतलब संपूर्ण सूचनातंत्र के ढ़ांचे से है। भारतीय सूचनातंत्र का पूरा ढांचा औद्योगिक समूहों के नियंत्रण में है। मैं सूचना प्रसारण के इस माध्यम को ‘मीडिया’ की बजाय ‘पत्रकारिता’ कहना ज्यादा उचित मानता हूं। मैं जो लिखता हूँ और एक बडे़ पाठक समूह तक अपनी बात पहुँचाना चाहता हूँ यह ‘पत्रकारिता के द्वारा ही करता हूँ, इसलिए अपनी प्रिय ‘पत्रकारिता’ के चेहरे पर ‘मीडिया’ का भूत जितना कम चढे,़ मैं खुद को उतना अधिक उन्मुक्त महसूस करता रहूंगा। आज बहस ‘पत्रकारिता पर बहुत कम ‘मीडिया’ पर बहुत अधिक हो  रही है। मैं समझता हूं कि पत्रकारिता किसके लिए इस विषय पर खुली बहस होनी चाहिए। पत्रकारिता होगी तो हर हाल में ‘जन’ के लिए ही होगी। पत्रकारिता कभी ‘खास’ के लिए नहीं होती है। आज सŸाापरस्त पूंजीपरस्त पत्रकारिता भारतीय पत्रकारिता का असली चेहरा तैयार करता है। जिस पत्रकारिता में ‘जन’ नहीं हैं उस पत्रकारिता को पत्रकारिता के बजाय ‘मीडिया’ कहो तो ज्यादा सुविधा है। पत्रकारिता जितनी पेशेवर होती गयी, समाज और जन से उतनी दूर होती गयी। पेशे में धंधा और आजीविका मुख्य लक्ष्य होता है। जन के सवाल जन आन्दोलन के मुद्दे पेशेवर पत्रकारिता के उद्देश्य नहीं होते। अब ऐसे ही पेशेवर पत्रकारों के बडे़ समूह ने जब पत्रकारिता को पूरी तर नौकरीकारिता में बदल दिया है तो वे बार-बार मीडिया-मीडिया-मीडिया का शोर करेंगें ताकि आप यकीन करिये वे जो पत्रकारिता नहीं कर रहें हैं उसके लिए वे नहीं, उनके ऊपर बैठा मालिक समूह मीडिया घराना जिम्मेदार है। मैं समझता हूँ कि अखबार या चैनल का संवाददाता, उपसंपादक या संपादक सबसे पहले पत्रकार होता है और उसे अपने पत्रकारिता दायित्व के निर्वाह की चुनौती कबूल करनी चाहिए। अखबारों और चैनलों के भीतर कार्यरत पत्रकार अगर अपनी पत्रकारिता के महान लक्ष्य को हर हाल में अंजाम देने की सौगंध लेते है तो पत्रकारिता का असली मतलब साबित हो पायेगा। मैं मीडिया के हौवा को सामने रखकर सवाल नहीं करना चाहता। ‘मीडिया’ का मतलब हमारे सामने एक निर्जीव पंूजी का स्टैªक्चर(ढ़ांचा) खड़ा होता है। इस निर्जीव ढं़ाचे से हम किस तरह संवाद कर सकते हैं। जनांदोलन और मीडिया की बजाय जनांदोलन और पत्रकारिता कहिये तो पत्रकार समूह के किसी मूर्धन्य पत्रकार या प्रशिक्षु पत्रकार से आप सीधे संवाद कर सकते हैं। इस समय पत्रकारिता संवाद हीनता के चरम पर जा चुकी है। हमारी पत्रकारिता के भीतर संवाद नहीें होगा तो पूंजीतंत्र  का ढ़ंाचा पूरी पत्रकारिता को लोहे और प्लास्टिक के ढ़ंाचे में बदल देगा। अगर जनांदोलन पर मनन करें तो देखिए क्या भारतीय पत्रकारिता के नियंता संपादकों, चैनल प्रमुखों के पास आंख और कान तो बचे हैं? ये देखते भी हैं और सुनते भी हैं तो देश में दमन के विरूद्ध जारी जनांदोलनों की आवाज इनके कान तक आकर किस तरह ठहर जाती है?   
प्रश्न- नंदीग्राम के जनआंदोलन पर सबसे पहले आपकी चर्चित पुस्तक ‘नंदीग्राम डायरी’ प्रकाशित हुई। इस आंदोलन में मीडिया ने आम जनता से जुडे सरोकार को कितना तवज्जो दिया ?
पुष्पराज-नंदीग्राम को सामने रखकर भारतीय पत्रकारिता के सूत्रधारों को आत्म समीक्षा करनी चाहिए। अंग्रेजी पत्रकारिता में सबसे बेहतर माने जाने वाले अखबार ‘द हिन्दू’ ने नंदीग्राम के साथ सही भूमिका नहीं निभायी तो पत्रकारिता में अंतराष्ट्रीय रूप से डंका पीटने वाले संगठन बी0बी0सी0 की भूमिका भी हास्यास्पद रही। खेतिहर पत्रकारिता के चर्चित पत्रकार पी0 साईनाथ ने नंदीग्राम के कृषक संग्राम को दर्ज करना जरूरी नहीं समझा। मालूम नहीं साईनाथ ने नंदीग्राम के किसानों को किस तरह से देखा । नंदीग्राम संग्राम को भारतीय मीडिया कभी संप्रदायिक शक्तियों का उन्माद तो कभी तृण मूल कांग्रेस और माओवादियों का आतंक घोषित करता रहा। नंदीग्राम संग्राम को प्रभाष जोशी ने जरूर नंदीग्राम जाकर समझने की कोशिश की और कृषक संग्राम के सत्य को अपने ‘कागद-कारे’ में दर्ज किया। लेकिन प्रभाष जोशी जिस ‘जनसŸाा’ के संस्थापक संपादक रहे, उस ‘जनसŸाा’ ने नंदीग्राम के ‘जन’ की आवाज नहीं सुनी। ‘जनसŸाा’ का कोलकाता संस्करण संग्राम के विरुद्ध खबरें छापता रहा और प्रभाष जोशी सलाहकार संपादक होते हुए भी ‘जनसŸाा’ को जन के पक्ष में खड़ा रहने के लिए मजबूर नहीं कर सके। नंदीग्राम भारतीय पत्रकारिता के कृष्णपक्ष को उजागर करता है। मुझे संतोष है कि भारतीय पत्रकारिता अंगे्रजी और हिन्दी पत्रकारिता से निर्देशित नहीं होती है और नंदीग्राम की आवाज बंाग्ला अखबारों में सुर्खियों से आती रही। बंगाल का सबसे बड़ा अखबार आनंद बाजार अंततः नंदीग्राम संग्राम के विरुद्ध राज्यपोषित हिंसा का साथ देता रहा लेकिन दैनिक स्टेटममेन(बांग्ला) और वर्तमान ; (बांग्ला) जैसे अखबार जन के साथ डटे रहें। 
प्रश्न-जनआंदोलनों की खबरों के मामले में कारपोरेट के हस्तक्षेप को किस रूप में देखते है?
 पुष्पराज- जन आंदोलन की खबरों को रोकने के मामले में काॅरपोरेट समूह सीधे तौर पर कामयाब हो सकते है, मुझे ऐसा यकीन नहीं होता है।मैं समझता हूँ कि किसी भी अखबार या चैनल का मालिक जनांदोलन की खबरों को रोकने की ताकत नहीं रखता है, अगर उसके भीतर कार्यरत पत्रकारों में जन और जनांदोलनों की खबरों को कवर करने की इच्छाशक्ति हो। मैंने देखा है कि नर्मदा बचाओं आंदोलन जैसे चर्चित अहिंसक आंदोलन की खबर को इसलिए रोक दिया गया कि उस अंगे्रजी अखबार का समाचार संपादक नर्मदा बचाओं आंदोलन के बारे मे उलट राय रखता है। पेशेवर पत्रकार ज्यादातर आर्थिक उदारवाद और इंडिया सांइनिंग के पक्षधर है।  मालिक जन और जनांदोलन की खबरें कवरेज करने से रोकता है, ऐसा बहुत हद तक सही नहीं है। ऐसे पत्रकार जो पेशे से ऊपर पत्रकारिता को रखते है। वो काॅरपोरेट हस्तक्षेप से टकरा सकते हैं, लेकिन मुझे ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि आप एक चैनल के प्रमुख हैं और आप इस जनांदोलन को कवर करना चाहते है और आपको आपके मालिक ने ऐसा करने से रोक दिया। 
प्रश्न-बडे मीडिया घरानों की जनआंदोनल में भूमिका और लधुपत्रिकाओं की भूमिका में आप क्या फर्क देखते हैं, लधुपत्रिकाएं किस रूप में जनआंदोलनों को देखती हैं?
पुष्पराज-1992 में भारत में आर्थिक उदारवाद का दौर आया इस दौर में अखबार समूहों ने वेज बोर्ड की बजाय कंटैªक्ट की नौकरी को ज्यादा प्राथमिकता दी। इसी दौर में भारत में ‘कंटैªक्ट जर्नलिज्म’ का दौर शुरू हो गया। समाजसेवा के क्षेत्र में एन0जी0ओ0 कंटैªक्ट सोसल वर्क करते हुए वेतन भोगी सोसल वर्कर तैयार करते हैं, उसी तरह ‘कंटैªक्ट जर्नलिज्म’ ने पत्रकारिता की रीढ़ छीन ली। रीढ़हीन संपादक जो कभी तन कर खड़ा होना नहीं सीख पाये, उनके सदैव दंडवत स्वरूप पर क्या रोना? जंहा तक बडे़ मीडिया घरानों की जनांदोलन में भूमिका का सवाल है तो इमरजेंसी के समय इंडियन एक्सप्रेस और स्टेट्समेन की भूमिका सŸाा के विरूद्ध जन के साथ की रही। एक्सप्रेस समूह के भीतर का यह ढ़ांचा प्रभाष जोशी के नेतृत्व वाले जनसŸाा में दिखता रहा । एक समय इंडियन एक्सप्रेस नर्मदा बचाओ आंदोलन के विरुद्ध प्रायोजित खबरंे छापता रहा लेकिन जनसŸाा की भूमिका जन और आंदोलन के साथ कायम रही। बडे़ घराने हर हाल में आंदोलन के विरोधी होते हैं लेकिन जनांदोलन के बढ़ते दबाव से वे खबरें रोक नहीं पाते। नंदीग्राम के संग्राम की खबर जब देश के बडे़ अखबारों में जगह नहीं ले पा रहीं थी तब दिल्ली से प्रकाशित एक साप्ताहिक समाचार पत्र ‘संडे पोस्ट’ ने नंदीग्राम की आवाज को तवज्जो दिया था। जाहिर है कि बड़ी पूंजी के अखबार जब जनता की आवाज को दबाते हंै तो छोटी पूंजी के समाचार पत्र जन संघर्ष को प्राथमिकता देते हैं। ये छोटी पूंजी वाले समाचार पत्र तत्काल एक आंदोलन को तवज्जो देते हैं और कालांतर में इसे प्रतिबद्धता की तरह कायम नहीं रख पाते। लघु पत्रिकाओं की भूमिका हर हाल में जन और जनांदोलन के पक्ष में रहती है। लघु पत्रिकाएं एक प्रगतिशील बौद्धिक समाज से जुड़े होते हैं। ये व्यावसायिक कम व साहित्यिक ज्यादा होते हंै। इसलिए अपने पाठक वर्ग के मिजाज का ख्याल रखते हुए ये जन और जनांदोलन के प्रति हर हाल में समर्थन की भूमिका दिखाते हैं। इनकी समस्या यह है कि हर लघु पत्रिका के संपादक महोदय के पास लिखने वालों का एक सीमित लेखक समूह होता है। वे जिस लेखक से स्त्रीवाद पर आलेख लिखवाते हैं, उसी लेखक से सेज विरोधी कृषक जनांदोलन पर आलेख मांगते हैं। हिन्दी लघु पत्रिकाओं का विवेक संपादक की जेब में सिमटा होता है। हिन्दी के नामचीन लेखक जन और जनांदोलन को अखबारों की रिर्पोटों से ही ज्यादा जानते हैं। हिन्दी पट्टी में हो रहे किसी सुगबुगाहट या किसी आपदा को जमीन पर खड़ा होकर कितने लेखक दर्ज करते हंै। ऐसे में लघुपत्रिकाओं की चुनौती बढ़ जाती है कि आप कथा कहानी, आलोचना की लकीर से आगे जैतापुर, कंुडाकुलम, काकीनाडा के आंदोलन को भी दर्ज करिये। हिन्दी की लघु पत्रिकाओं में तीसरी दुनिया की लोकप्रियता कायम है। साहित्यिक पत्र-पत्रिका के संपादक जनांदोलनों पर आधारित कोई अंक नहीं निकालते और हर अंक में जनांदोलनों पर केन्द्रित आलेख-रिपोर्ताज प्रकाशित करना अपनी जिम्मेदारी नही समझते। इन संपादकों को ऐसा लगता है कि जनांदोलन पर केन्द्रित आलेखों का प्रकाशन साहित्यिक पत्रिकाओं का दायित्व नहीं । जनांदोलनों को प्रमुखता नहीं देने वाला साहित्य और पत्रकारिता लगातार निर्जीव होता जायेगा।                       
प्रश्न-अन्ना आंदोनल को क्या जनआंदोन की श्रेणी में रख कर देखा जा सकता है? आप इस आंदोनल में मीडिया की भूमिका को किस तरह देखते है?                 पुष्पराज-अण्णा हजारे ने भ्रष्टाचार विरोधी जो अभियान चलाया उसे जनांदोलन कहना, जनआंदोलन की परिभाषा का मजाक है। एन0जी0ओ0 समूह और नौकरशाहों की ताकत ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध जो तिलिस्म निर्मित किया गया उसे भारतीय मीडिया ने जनांदोलन कहा । मीडिया की भूमिका अण्णा और भ्रष्टाचार विरोधी कथित आंदोलन को कवरेज करने में काफी हास्यास्पद रही। आम आदमी के सामने मीडिया ने जो हास्यास्पद छवि अण्णा के बहाने बनायी है, अब देश के किसी भी हिस्से में पत्रकारों के लिए सम्मान के दो शब्द आम आदमी की जुबान में नहीं हैं।  
प्रश्न-आप जनआंदोलन और मीडिया के संदर्भ में अपने अनुभवों के आधार पर क्या सलाह देना चाहेंगे?                                                           
पुष्पराज-अगर आप तय करते है कि पत्रकारिता किसके लिए करनी है तो आप तयशुदा लक्ष्य की तरफ पांव रोंपते हैं। शायद अपने साथ भी ऐसा ही हुआ। जन और जनता के द्वारा जारी जन संघर्षों के बीच से गुजरते हुए अगर लिखंे, नही ंतो क्या करें? मुझे लगा मैं क्या लिखकर युद्ध का साक्षी हो रहा हूँ। दिल्ली से बाहर जो एक अलग भारत मैं देखता हूँ वह युद्धरत भारत है । नर्मदा में जन संघर्ष का 26 वर्ष पूरा हो गया है। विस्थापितों का पुनर्वास इतने वर्षो में नहीं हुआ। लेकिन पुनर्वास पैकेज में 500 करोड़ का घोटाला हो गया। न्यायिक आयोग पुनर्वास घोटाला की जांच कर रहा है। 26 वर्षो के इस अहिंसक संघर्ष को लिखने के लिए एक नहीं 26 पत्रकारों का दस्ता होना चाहिए। देश में कुछ पत्रकार हैं, जो जनांदोलन की खबरें लिखने के लिए युद्धरत किसानों, आदिवासियों के जीवन के दुखः को साझा करते है। पत्रकारों की पूरी फौज चाहिए। आदिवासियों की जिंदगी का सफाया करने वाला शासकीय अभियान कब खत्म होगा। हमारे देश के मूल निवासी आदिवासियों के 600 गांव छतीसगढ़ में उजाड़ दिये गये। हमारे लोग नहीं बचेंगें तो हमारी पत्रकारिता का क्या होगा? वह आदमी जो मुझे आवाज दे रहा है, उसकी आवाज हम लिख सकते हैं तो मालिको की पूंजी मुझे कब तक दबा कर रखेगी? हमने देश के सबसे अमीर ताकतवर अंबानी समूह के भ्रष्टाचार को उजागर करने का स्वप्न जीता है। अगर आप स्वप्नदर्शी नहीं हैं तो पत्रकारिता आपके लिए नहीं है।